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चेहरे बदल के मिलता है

>> Tuesday, 11 October 2011

'ग़ज़ल'


चेहरे बदल के मिलता है 



रहता है चुप्पियाँ साधे बेहद संभल के मिलता है
ये वक्त आजकल हम से चेहरे बदल के मिलता है

उस को फिजूल लोगों से फुरसत नहीं है मिलने की
पर जिन से उस का मतलब है बाहर निकल के मिलता है

ये है जो चांद पूनम का चांदी का एक सिक्का है
होता है जब मेहरबाँ ये हम से उछल के मिलता है

चेहरा तो इस हुकूमत का रहता है धूप में लेकिन
इक अजनबी सा अंधियारा पीछे महल के मिलता है

चाहे हो आईने जैसा दरिया का ऊपरी पानी 
कीचड़ का गंदला चेहरा नीचे कमल के मिलता है


                                                                                                                 ... कुमार शिव 


6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 11 October 2011 at 00:15  

मौजूदा वक्त पर लिखी बेहतरीन ग़ज़ल है।
जन्म दिन पर प्रणाम और हार्दिक शुभकामनाएँ!

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" 12 October 2011 at 00:00  

श्रीमान कुमार शिव जी, आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये और बधाई. आपकी उपरोक्त रचना बहुत अच्छी है. आपके इस ब्लॉग पर काफी दिनों बाद पोस्ट आई है.

Onkar 15 October 2011 at 21:51  

bahut sundar panktiyan

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